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अवकाश के प्रकार

*सभी राजकीय कार्मिक इसे किसी कागज़ पे नोट कर ले। छुट्टी एवं उसके नियम :-* *1 - अर्जित अवकाश :-* यह अवकाश प्रत्येक वर्ष 31 दिन के देय है। 1 जनवरी को 16 दिन तथा 1 जुलाई को 15 दिन दो किस्तों में देय है।  यह अवकाश पूरे सेवा काल में 300 दिनों तक जमा किया जा सकता है। भारत में लगातार 120 दिन की तथा भारत से बाहर 180 दिनों की छुट्टी देय है। _*मूल नि.- 81-बी(1)*_ *2 - चिकित्सा अवकाश :-* यह अवकाश स्थाई कार्मिकों को पूरे सेवा काल में 12 माह तक पूरे वेतन पर तथा 6 माह तक अर्ध वेतन पर देय है। _*मूल नि.-81-बी(3)*_ *3 - निजी कार्य पर, अर्ध वेतन पर अवकाश :-* स्थाई कार्मिकों को यह अवकाश पूरे सेवा काल में 365 दिनों तक अर्ध वेतन पर देय है। यह अवकाश भी अर्जित अवकाश की तरह 1 जनवरी को 16 दिन तथा 1 जुलाई को 15 दिन कर्मचारी के खाते में जमा हो जाता है तथा यह अवकाश भी कर्मचारी के खाते में पुरा यानी 365 दिनों तक जमा किया जा सकता है। _*मूल नि.-81-बी(3)*_ *4 - असाधारण अवकाश ( बिना वेतन का ) :-* यह अवकाश अन्य अवकाश के साथ मिलाकार अथवा बिना वेतन का अवकाश अलग से 5 वर्ष तक का देय है। 5 वर्ष से अधिक श...

रामायण vs श्रीमदभागवत

" दक्षिण का एक ग्रन्थ " क्या ऐसा संभव है कि जब आप किताब को सीधा पढ़े तो रामायण की कथा पढ़ी जाए और जब उसी किताब में लिखे शब्दों को उल्टा करके पढ़े तो कृष्ण भागवत की कथा सुनाई दे। जी हां, कांचीपुरम के 17वीं शदी के कवि वेंकटाध्वरि रचित ग्रन्थ "राघवयादवीयम्" ऐसा ही एक अद्भुत ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ को ‘अनुलोम-विलोम काव्य’ भी कहा जाता है। पूरे ग्रन्थ में केवल 30 श्लोक हैं। इन श्लोकों को सीधे-सीधे पढ़ते जाएँ, तो रामकथा बनती है और विपरीत (उल्टा) क्रम में पढ़ने पर कृष्णकथा। इस प्रकार हैं तो केवल 30 श्लोक, लेकिन कृष्णकथा के भी 30 श्लोक जोड़ लिए जाएँ तो बनते हैं 60 श्लोक। पुस्तक के नाम से भी यह प्रदर्शित होता है, राघव (राम) + यादव (कृष्ण) के चरित को बताने वाली गाथा है ~ "राघवयादवीयम।" उदाहरण के तौर पर पुस्तक का पहला श्लोक हैः वंदेऽहं देवं तं श्रीतं रन्तारं कालं भासा यः । रामो रामाधीराप्यागो लीलामारायोध्ये वासे ॥ १॥ अर्थातः मैं उन भगवान श्रीराम के चरणों में प्रणाम करता हूं, जो जिनके ह्रदय में सीताजी रहती है तथा जिन्होंने अपनी पत्नी सीता के लिए सहया...

बिच्छु काटने के उपचार

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बिच्छू काटने पर तुरंत घरेलू उपचार                   बिच्छू के काटने पर फिटकरी का प्रयोग इस रामबाण साबित होता है।  फिटकरी को किसी साफ पत्थर पर थोड़ा सा पानी डाल कर इसे घिसें। फिर जहां पर बिच्छु ने काटा  हो वहां पर इस फिटकरी का पेस्ट लगाकर आग से थोड़ा सेंके। कैसा भी जहरीला बिच्छु का काटा  क्यों न हो इस फिटकरी के इस्तमाल से जहर सिर्फ 2 ही मिनट में असर उतर जाता है। फिटकरी को  चिमटी से पकड़ कर थोडा सा गर्म कर लें जैसे ही फिटकरी पिघलने लगे तो फिटकरी को बिच्छू के  काटे हुये जगह पर लगा दे फिटकरी तुरन्त वहां चिपक जायेंगी एंव पूरा जहर चूस कर अपने आप  उतर जायेंगी  इमली के बीज को साफ पत्थर पर घिसे घिसते-घिसते अन्दर का सफेद भाग निकल आयेंगा तो उसे  भी बिच्छु के काटने के जहग पर लगा दें तो यह चिपक जायेगा जैसे ही यह नीचे गिरे तो दूसरा बीज घिस कर लगाइयें इस प्रकार बिच्छु का जहर उतरने लगता हैं। बिच्छु के काटने पर माचिस की पांच  से छः तीलियाँ का मसाला को उतारकर पानी में घिसकर बिच्छु के काटने वाले जहग पर लगाने ...

शाकाहारी बनों

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*कंद-मूल खाने वालों से* मांसाहारी डरते थे।। *पोरस जैसे शूर-वीर को* नमन 'सिकंदर' करते थे॥ *चौदह वर्षों तक खूंखारी* वन में जिसका धाम था।। *मन-मन्दिर में बसने वाला* शाकाहारी *राम* था।। *चाहते तो खा सकते थे वो* मांस पशु के ढेरो में।। लेकिन उनको प्यार मिला ' *शबरी' के जूठे बेरो में*॥ *चक्र सुदर्शन धारी थे* *गोवर्धन पर भारी थे*॥ *मुरली से वश करने वाले* *गिरधर' शाकाहारी थे*॥ *पर-सेवा, पर-प्रेम का परचम* चोटी पर फहराया था।। *निर्धन की कुटिया में जाकर* जिसने मान बढाया था॥ *सपने जिसने देखे थे* मानवता के विस्तार के।। *नानक जैसे महा-संत थे* वाचक शाकाहार के॥ *उठो जरा तुम पढ़ कर देखो* गौरवमय इतिहास को।। *आदम से आदी तक फैले* इस नीले आकाश को॥ *दया की आँखे खोल देख लो* पशु के करुण क्रंदन को।। *इंसानों का जिस्म बना है* शाकाहारी भोजन को॥ *अंग लाश के खा जाए* क्या फ़िर भी वो इंसान है? *पेट तुम्हारा मुर्दाघर है* या कोई कब्रिस्तान है? *आँखे कितना रोती हैं जब* उंगली अपनी जलती है *सोचो उस तड़पन की हद*               ...

Today's voice

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आज का संदेश-  ************** आज का भारतीय समाज एवं प्रचीन भारतीय समाज की तुलना करो तो मन में एक कसक सी उठती है | आज एक बच्चे से लेकर 80 वर्ष का बुज़ुर्ग आधुनिकता की अंधी दौध में लगा हुआ है आज हम पश्चिमी हवाओं के झंझावत में फंसे हुए है | पश्चिमी देशो ने हमे बरगलाया है और हम इतने मुर्ख की उससे प्रभावित होकर इस दिशा की और भागे जा रहे है जिसका कोई अंत नही है | वास्तव में देखा जाए तो हमारा स्वयं का कोई विवेक नही है हम जैसा देख लेते है वैसा ही बनने का प्रयत्न करने लगते है निश्चित रूप से यह हमारी संस्कृति के ह्रास का समय है जिस तेज गति से पाश्चात्य संस्कृति का चलन बढ़ रहा है, उससे लगता है कि वह समय दूर नहीं, जब हम पाश्चात्य संस्‍कृति के गुलाम बन जायेंगे और अपनी पवित्र पावन भारतीय संस्कृति, भारतीय परम्परा सम्पूर्ण रूप से विलुप्त हो जायेगी, गुमनामी के  अंधेरों में खो जायेगी। आज मनोरंजन के नाम पर बुद्धू बॉक्स से केवल अश्लीलता और फूहड़पंन का ही प्रसारण हो रहा है हमें मनोरंजन के नाम पर क्या दिया जा रहा है मारधाड़, खुन खराबा, पर फिल्माए गए दृश्य मनोरंजन के नाम पर मानवीय ग...

चाणक्य के अमर वाक्य

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चाणक्य के 15 अमर वाक्य 1)दुनिया की सबसे बड़ी ताकत पुरुष का विवेक और महिला की सुन्दरता है। 2)हर मित्रता के पीछे कोई स्वार्थ जरूर होता है, यह कड़वा सच है। 3)अपने बच्चों को पहले पांच साल तक खूब प्यार करो। छः साल से पंद्रह साल तक कठोर अनुशासन और संस्कार दो। सोलह साल से उनके साथ मित्रवत व्यवहार करो। आपकी संतति ही आपकी सबसे अच्छी मित्र है।" 4)दूसरों की गलतियों से सीखो अपने ही ऊपर प्रयोग करके सीखने को तुम्हारी आयु कम पड़ेगी। 5)किसी भी व्यक्ति को बहुत ईमानदार नहीं होना चाहिए। सीधे वृक्ष और व्यक्ति पहले काटे जाते हैं। 6)अगर कोई सर्प जहरीला नहीं है तब भी उसे जहरीला दिखना चाहिए वैसे दंश भले ही न हो पर दंश दे सकने की क्षमता का दूसरों को अहसास करवाते रहना चाहिए। 7)कोई भी काम शुरू करने के पहले तीन सवाल अपने आपसे पूछो... मैं ऐसा क्यों करने जा रहा हूँ ? इसका क्या परिणाम होगा ? क्या मैं सफल रहूँगा? 8)भय को नजदीक न आने दो अगर यह नजदीक आये इस पर हमला कर दो यानी भय से भागो मत इसका सामना करो। 9)काम का निष्पादन करो, परिणाम से मत डरो। 10)सुगंध का प्रसार हवा के रुख का म...

Cg Comedy

छ ग - हास्य रचना सावन म करेला फूटे            गरमी म पसीना देहाती ल कथें सुन्दरी             शहर के हसीना | शहर के हसीना संगी            मुश्किल कर दिस जीना देख के जवान टुरा मन             शुरू कर दिन पीना | जब ले लगे फागुन महीना                 टुरी मुचमुचात हे मोबाइल म रात रात भर            आनी बानी गोठियात हे | पढाई म मन न ई लागय       कापी पुस्तक तिरियात हे दाई ददा के कहे नी मानय               अब्बड़ सत्ती जात हे | का होगे जमाना ल संगी             ए ही समझ न ई आत हे मुंह म कपड़ा बांध के टुरी            गाड़ी म कहाँ  जात हे |